09

mein pregnant hoon

Dining Hall का माहौल बाहर से जितना नॉर्मल दिख रहा था, अंदर उतना ही उलझा हुआ था।

नाश्ता लगभग खत्म हो चुका था।

राजेंद्र ने नैपकिन टेबल पर रखते हुए कहा,

"अविनाश, आज ऑफिस जल्दी निकलना। दोपहर में बोर्ड मीटिंग है।"

"ओके, पॉप।" अविनाश ने सहज स्वर में जवाब दिया।

राजेंद्र उठकर अपने कमरे की तरफ चले गए।

अब डैनिंग हॉल में सिर्फ़ आरोही और अविनाश रह गए।

कुछ पल तक दोनों के बीच अजीब-सी खामोशी पसरी रही।

आरोही ने बिना उसकी तरफ देखे कॉफी का आख़िरी घूंट पिया और उठने लगी।

तभी अविनाश की आवाज़ सुनाई दी।

"आरोही..."

उसके कदम रुक गए।

वह धीरे से पलटी।

"हाँ ?"

अविनाश कुछ सेकंड तक चुप रहा।

फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,

"कल रात... अगर मेरी किसी बात से तुम्हें असहज महसूस हुआ हो... तो I'm sorry."

आरोही उसकी तरफ देखती रह गई।

शायद उसे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी।

उसने धीमे स्वर में कहा,

"कुछ बातें... मज़ाक में नहीं कहनी चाहिए, अविनाश।"

अविनाश ने सिर झुका लिया।

"शायद... मैं कभी-कभी अपनी हदें भूल जाता हूँ।"

आरोही की आँखों में पहली बार उसके लिए नाराज़गी से ज़्यादा चिंता दिखाई दी।

"तुम अच्छे इंसान हो। लेकिन अपनी फिलिंगस् को सही दिशा देना सीखो। हर एहसास का पीछा करना ज़रूरी नहीं होता।"

अविनाश ने उसकी बात बिना कुछ कहे सुन ली।

कुछ देर बाद उसने बस इतना कहा,

"कोशिश करूँगा।"

आरोही ने हल्की-सी मुस्कान दी।

"बस यही काफी है।"

इतना कहकर वह वहाँ से चली गई।

अविनाश उसे जाता हुआ देखता रहा।

उसने गहरी साँस ली।

शायद पहली बार उसे महसूस हुआ था कि कुछ रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती... उनकी मर्यादा में होती है।

उसी समय...

राजेंद्र अपने स्टडी रूम में पहुँचे।

टेबल पर रखा एक पुराना लिफाफा उनकी नज़र में आया।

लिफाफे पर कोई नाम नहीं था।

उन्होंने उसे खोला।

अंदर सिर्फ़ एक फोटो थी।

उन्होंने काँपते हाथों से फोटो उठाई...

और अगले ही पल उनकी आँखें अविश्वास से फैल गईं।

"यह... कैसे संभव है?"

उनके होंठों से बमुश्किल शब्द निकले।

कमरे के बाहर कोई खड़ा था।

दरवाज़े के नीचे उसकी परछाईं साफ़ दिखाई दे रही थी...

और अगले ही पल—

ठक... ठक... ठक...

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

दरवाज़े पर खड़ी आरोही ने जैसे ही अंदर झाँका, उसकी नज़र राजेंद्र के हाथ में पकड़ी हुई तस्वीर पर पड़ी।

"क्या हुआ?" उसने चिंता से पूछा।

राजेंद्र एक पल के लिए घबरा गए। उन्होंने जल्दी से तस्वीर पीछे छिपाने की कोशिश की, लेकिन तब तक आरोही की नज़र उस फोटो पर पड़ चुकी थी।

फोटो में राजेंद्र एक औरत के साथ खड़े थे। दोनों के चेहरों पर मुस्कान थी।

आरोही धीरे-धीरे उनके पास आई।

"ये... कौन है?"

राजेंद्र कुछ पल तक चुप रहे।

उसी समय उनके फोन की घंटी बज उठी।

स्क्रीन पर नाम चमका—

"नैना"

राजेंद्र का चेहरा एकदम उतर गया।

उन्होंने कॉल काटने की कोशिश की, लेकिन तभी आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

"फोन उठाइए..."

राजेंद्र ने काँपते हाथों से कॉल रिसीव की।

दूसरी तरफ से घबराई हुई औरत की आवाज़ आई—

"राजेंद्र... मैं और छिपा नहीं सकती। डॉक्टर ने कन्फर्म कर दिया है... मैं प्रेग्नेंट हूँ।"

आरोही के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसकी आँखें फैल गईं।

फोन स्पीकर पर नहीं था, लेकिन कमरे की खामोशी में वह आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।

राजेंद्र ने धीमे स्वर में कहा,

"नैना... अभी इस बारे में बात मत करो।"

लेकिन उधर से तुरंत जवाब आया—

"कब तक भागोगे? यह बच्चा तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।"

कॉल कट गई।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

आरोही की आँखें नम हो चुकी थीं।

उसने राजेंद्र की तरफ देखा।

"क्या... जो मैंने अभी सुना... वो सच था?"

राजेंद्र ने आँखें बंद कर लीं।

उनके पास कोई जवाब नहीं था।

आरोही की आवाज़ काँप रही थी।

"इतने सालों का रिश्ता... और मुझे कभी सच बताना ज़रूरी नहीं समझा?"

राजेंद्र ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

"आरोही... मेरी बात सुनो।"

लेकिन उसने एक कदम पीछे हटते हुए कहा,

"नहीं... अभी नहीं।"

उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

वह बिना कुछ और कहे कमरे से बाहर निकल गई।

राजेंद्र वहीं खड़े रह गए।

उनके हाथ से वह पुरानी तस्वीर फर्श पर गिर गई...

आरोही तेज़ कदमों से अपने कमरे में आई।

जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, उसकी हिम्मत जवाब दे गई।

वह धीरे-धीरे चलकर बेड पर बैठ गई और अगले ही पल वहीं लेट गई।

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

छत को घूरते हुए उसके कानों में बार-बार वही शब्द गूँज रहे थे—

"मैं प्रेग्नेंट हूँ..."

हर बार ये शब्द उसके दिल को पहले से ज़्यादा दर्द दे रहे थे।

उसने काँपते हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।

"क्यों...?" उसके होंठों से टूटी हुई आवाज़ निकली।

"अगर यही सच था... तो मुझसे शादी क्यों की?"

कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था।

सिर्फ़ उसकी सिसकियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

उसकी नज़र बेडसाइड टेबल पर रखी अपनी और राजेंद्र की शादी की फोटो पर पड़ी।

कुछ पल तक वह उसे देखती रही।

फिर काँपते हाथों से फोटो उठाई।

उस तस्वीर में दोनों मुस्कुरा रहे थे।

लेकिन आज वही मुस्कान उसे झूठी लग रही थी।

उसकी आँखों से एक और आँसू तस्वीर पर गिर पड़ा।

उसी समय कमरे के बाहर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

दरवाज़े के सामने राजेंद्र खड़े थे।

उन्होंने धीरे से दरवाज़े पर दस्तक दी।

"आरोही... दरवाज़ा खोलो।"

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

उन्होंने फिर कहा,

"मुझे पता है तुम बहुत दुखी हो... लेकिन एक बार मेरी बात सुन लो।"

आरोही ने आँखें बंद कर लीं।

उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

उसने धीमे लेकिन टूटे हुए स्वर में कहा,

"आज... मेरे पास सुनने के लिए कुछ भी नहीं बचा है।"

दरवाज़े के बाहर खड़े राजेंद्र चुप हो गए।

कमरे के अंदर और बाहर...

दोनों तरफ़ सिर्फ़ खामोशी थी।

To Be Continued...

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