
रात के 11 बजे...
क्लब का शोर अब भी वैसे ही गूंज रहा था।
लेकिन अविनाश के लिए जैसे सारी आवाज़ें गायब हो चुकी थीं।
कबीर और बाकी दोस्त किसी बात पर हंस रहे थे...
मगर अविनाश की सोच फिर वहीं अटक गई थी।
आरोही...
उसका नाम आते ही उसके अंदर कुछ अजीब सा होने लगता था।
अचानक उसने अपने हाथ में पकड़ा ग्लास टेबल पर रख दिया।
उसके जबड़े सख्त हो गए।
दांत भींचते हुए वह धीरे से बुदबुदाया,
"अब बस... बहुत हुआ।"
उसकी आंखों में झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी
"मैं और कंट्रोल नहीं कर सकता..."
"ऐसे तो मैं सच में पागल हो जाऊंगा।" ये सब अविनाश खुद से बोला!
कबीर ने उसकी तरफ देखा और बोला।
"क्या हुआ?"
अविनाश ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह अचानक अपनी चेयर से उठा और क्लब से बाहर निकल गया।
कबीर भी उसके पीछे भागते हुए बोला,
"अरे भाई, हुआ क्या है?"
क्लब के बाहर ठंडी हवा चल रही थी।
अविनाश ने दोनों हाथ बालों में फेरते हुए गहरी सांस ली।
आज पहली बार वो किसी से अपने दिल की बात बताने लगा,
"मुझे समझ नहीं आ रहा मेरे साथ क्या हो रहा है, कबीर।"
कबीर चुपचाप सुनता रहा।
"सुबह उठता हूँ तो उसका ख्याल..."
"ऑफिस जाता हूँ तो उसका ख्याल..."
"रात को सोने जाता हूँ तो भी वही।"
अविनाश हल्का सा हंसा।
लेकिन उस हंसी में बेचैनी थी।
"मैंने अपनी जिंदगी में कभी किसी के बारे में इतना नहीं सोचा।" जितना उसके बारे में सोच रहा हूँ,
कबीर की मुस्कान धीरे-धीरे चौड़ी हो गई, और वो आगे आकर बोला,
"Congratulations."
अविनाश ने उसे घूरते हुए कहाँ,
"मजाक मत कर।"
कबीर ने कंधे उचकाते हुए बोला
"मैं मजाक नहीं कर रहा।"
"तू प्यार में पड़ चुका है, फ्रेंड।"
कुछ सेकंड तक खामोशी छाई रही।
अविनाश ने नजरें फेर लीं।
जैसे वह खुद भी इस सच से भागना चाहता हो।
लेकिन दिल के किसी कोने में...
वह जानता था कि कबीर गलत नहीं था।
उसी समय...
शहर के दूसरे कोने में...
राजवंश मेंशन
स्टडी रूम में अब भी लाइट जल रही थी।
आरोही अकेली बैठी गेस्ट लिस्ट और इवेंट की फाइलें चेक कर रही थी।
बारह बजे
उसने गहरी सांस ली और फाइल बंद कर दी।
तभी उसकी नजर टेबल के कोने पर रखी एक छोटी सी चिट पर पड़ी।
उस पर किसी ने जल्दी-जल्दी में लिखा था—
"काम थोड़ा कम किया करो। कभी-कभी आराम भी कर लिया करो।"
नीचे कोई नाम नहीं था।
लेकिन लिखावट पहचानने में उसे एक सेकंड भी नहीं लगा।
अविनाश...
आरोही के होंठों पर अनजाने में मुस्कान आ गई,
"पागल..."
वह धीरे से बुदबुदाई।
उसे नहीं पता था...
उसे नही पता था की उसके प्यार में कोई पागल हो चुका है
अविनाश अपनी लेम्बोर्गिनी लेकर मेंशन के लिए निकल गया
कुछ देर बाद...
अविनाश की काली लेम्बोर्गिनी राजवंश मेंशन के बड़े से गेट के सामने आकर रुकी।
रात के लगभग साढ़े बारह बज रहे थे।
पूरे मेंशन में शांति छाई हुई थी।
सिर्फ गार्डन की हल्की पीली लाइटें जल रही थीं।
अविनाश कार से बाहर निकला।
उसने क्लब में ड्रिंक तो की थी, लेकिन वह पूरी तरह होश में था।
बस शराब का हल्का असर उसकी चाल और चेहरे की मुस्कान में दिखाई दे रहा था।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
आज उसके दिमाग में सिर्फ एक ही नाम था—
आरोही...
उधर...
स्टडी रूम में आरोही अभी भी कुछ फाइलें समेट रही थी।
तभी बाहर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरोही चौंक गई।
वह तुरंत बाहर निकली।
जैसे ही उसने लॉबी में कदम रखा...
उसकी नजर सामने खड़े अविनाश पर पड़ी।
अविनाश उसे देखते ही कुछ सेकंड के लिए वहीं रुक गया।
उसकी आंखों में वही चमक आ गई जो हर बार आरोही को देखकर आ जाती थी।
और फिर...
उसके होंठों पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई ।
"हाय..."
उसने धीमे से कहा।
आरोही ने भौंहें सिकोड़ते हुए बोली,
"तुमने ड्रिंक की है?"
अविनाश ने सिर खुजाते हुए मुस्कुराकर कहा,
"थोड़ी सी..."
इतना कहते हुए वह हल्का सा लड़खड़ा गया।
आरोही तुरंत आगे बढ़ी और उसका हाथ पकड़ लिया।
"ध्यान से!"
उसने उसे गिरने से संभाल लिया।
अविनाश की नजरें अब उसके चेहरे पर टिक गईं।
आरोही उसके बहुत करीब थी।
इतनी करीब कि आरोही का दिल एक पल के लिए तेज धड़क उठा।
"तुम बहुत अच्छी हो..."
अविनाश अचानक बुदबुदाया।
आरोही ने हैरानी से उसे देखते हुए कहाँ,
"क्या?"
अविनाश हल्का सा हंसा फिर बोला,
"कुछ नहीं..."
लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान गायब नहीं हुई।
आरोही उसे सहारा देकर सोफे तक ले गई।
"बैठो यहाँ।"
आज हैरानी वाली बात यह थी कि बिना बहस किए अविनाश चुपचाप बैठ गया।
फिर सिर पीछे टिकाकर उसने आंखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद...
उसने धीरे से कहा,
"आरोही..."
"अगर कोई इंसान हर वक्त किसी एक के बारे में सोचने लगे..."
"तो उसे क्या कहते हैं?"
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
उसके चेहरे पर हल्की उलझन थी वो बोली,
"पता नहीं..."
अविनाश के होंठों पर फीकी सी मुस्कान आई और अविनाश बोला,
"मुझे पता चल गया है।"
आरोही कुछ समझ पाती उससे पहले ही...
अविनाश ने आंखें बंद कर लीं।
और सिर सोफे के पीछे टिका दिया।
वह बेहद थका हुआ लग रहा था।
आरोही कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसके बिखरे हुए बालों को देखकर धीरे से सिर हिलाया।
"सच में पागल है..."
उसे बिल्कुल अंदाजा नहीं था...
कि जिस इंसान को वह पागल कह रही थी...
वो उसके प्यार में पूरी तरह डूब चुका है।
To be continued..








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